Wednesday, 17 October 2018

-------------------- #सांस्कृतिक_विनाश --------------------
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आपने हमेसा सुना होगा कि ,हिन्दुओ में अमुक पर्व आने वाला है , सनातन संस्कृति में पर्वो का एक महत्वपूर्ण स्थान है चाहे वो कोई भी हो क्योंकि हर पर्व का एक सामाजिक, मानसिक और शारीरिक लाभ है , और विधर्मी उन त्योहारों पर प्रश्नचिन्ह लगाकर उन्हें विकृत करके सिर्फ उन त्योहारों का उपहास ही नही कर रहे बल्कि हमारी सनातनी परम्परा पर भी आघात कर रहे है जिससे सिर्फ समाज ही नही अपितु हमारा भी शारीरिक और मानसिक हाँनि हो रही है ।।

आपने ये तो जान लिया की पर्व मतलब उत्साह या उल्लास मनाने का दिन लेकिन आप ढूँढिये तो पर्व का एक अर्थ मिलता है संधि काल ,संस्कृत में पर्व का एक अर्थ संधिकाल भी मिलता है , और पर्व का मूल भाव भी यही है , संधिकाल का पर्व से क्या तात्पर्य है मतलब है आइये देखते है -

हिन्दुओ के पर्वो की एक लिस्ट बनाये आप आपको एक पैटर्न मिलेगा , जैसे जहां ठंडी खत्म और गर्मी शुरू हो रही है , गर्मी खत्म बारिश शुरू हो रही है , बारिश खत्म ठंड शुरू हो रही है - अब दीपावली दशहरा पड़ता है बारिश और ठंड के संधिकाल में , होली पड़ती है ठंड और गर्मी के संधिकाल में , शिवरात्रि आदि पड़ती है गर्मी और बारिश के संधि काल मे । ये सिर्फ हिन्दुओ के प्रमुख पर्व नही है बल्कि मानव सभ्यता नए मौसम के लिए खुद को तैयार करती है, व्रत ,उपवास भोजन की निर्धारित मात्रा और श्रेणी इसमे सहायता करती है उदाहरण -  बारिश में पालक की मनाही है ,कारण - बरसात के मौसम में पालक और अन्य पत्तेदार सब्जियों में में छोटे-छोटे कीड़े पड़ जाते हैं।

सनातनी पुरुषार्थ खत्म कैसे किया जा रहा है -

पहले सनातनी पर्वो को लेकर हीन भावना भरी जाती है उसका माध्यम बनते है प्रिंट मीडिया , इलेक्ट्रॉनिक मीडिया फिर कुछ तथ्यों को इस तरह तोड़कर कॉइन कर दिया जाता है जिसे जातिवादी लपक लेते है, जैसे आजकल रावण दहन को लेकर ब्राम्हण समाज विरोध कर रहा है अब राक्षस किसके आराध्य हो सकते है ये सबको पता लेकिन पढ़े लिखे लोग भी इसमे सम्मिलित है देखकर बुरा लगता है , इन सबसे फिर आसानी से सनातनी सामाजिक एकजुटता को छिन्न भिन्न किया जाता है , चलिए विस्तार से समझते है -

होली में पानी की बर्बादी सूखी होली खेलने का निर्देश , समर्थन हिन्दुओ ने ही किया और उल्लास का पर्व एक सीढ़ी नीचे आया , जो पर्व समाज को जोड़ता था लोगो का आपसी सौहार्द बढ़ता था उसमे अब मांस मदिरा का सेवन करके उसे सामाजिक ताना बाना बिगाड़ने का एक जरिया बना दिया , बसंत में सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण में आ जाता है। फल-फूलों की नई सृष्टि के साथ ऋतु भी 'अमृत प्राण' हो जाती है। इसलिए होली के पर्व को 'मन्वन्तरांभ' भी कहा गया है। लेकिन होली आते ही सबसे पहले जो चीज आनी चाहिए थी उल्लास उत्साह खुसी लेकिन अब वही नाम आता है हुड़दंग ,दंगाई छेड़छाड़ । होली का उत्साह कब होली की हुड़दंग बन गया कभी गौर किया आपने ????

श्रावण मास में शिवलिंग पर दूध मत चढ़ाओ ,इसपर पीछे की पोस्ट पढ़ सकते है इसका खंडन कर चुका हूँ , लेकिन बाकायदा इसको लेकर हीनभावना से भरा गया नई पीढ़ी को ताकि इन उत्सवों को लेकर एक दूरी बन जाये और हम अपनी जड़ों से दूर हो जाये ।

अब आते है दशहरा और दीपावली पर - मोमबत्तियां आ गयी ,झालर आगये दीपक की जगह सामाजिक व्यवस्था में सम्मिलित एक कुम्हार वर्ग को जिसकी जीविका इससे चलती थी वो धीरे धीरे टूटता जा रहा है या यूं कह लीजिए टूट गया , शस्त्रपूजन न होने से हथियार लेने बन्द कर दिए  लोहार टूटता जा रहा है ऐसे ही पटाखों पर भी रोक लगाकर एक दलित श्रमिक का हाथ भी काट दिया गया क्योंकि पटाखों के शोर सिर्फ दीपावली में होते है क्रिसमस न्यू ईयर पर इनसे ऑक्सीजन निकलती है । तो भाइयों सांस्कृतिक विनाश की ओर हम तीव्र गति से अग्रसर है और इसमे विधर्मी कम जिम्मेदार है उससे कही ज्यादा हम है । और हाँ कहते है कि सनातन सदैव था सदैव रहेगा ये वही कबूतर की तरह है जो बिल्ली को अपनी ओर आता देखकर आंख बंद कर लेते है कि खतरा टल गया लेकिन वो मृत्यु को ही प्राप्त होती है ।

धर्मपरिवर्तन हो रहे है लोग हिंदुत्व को गाली देते है क्योंकि हमने किया , ये स्थिति हमने खड़ी की ये सामाजिक व्यवस्था हमने भंग की जिसे अब भी समय है सुधारा जा सकता है ।

हम अपनी संस्कृति को हजारों सालों से बचाते आये है फिर भी आज की भौगोलिक क्षेत्र और प्राचीन सनातन संस्कृति की भौगोलिक क्षेत्र को जरा ध्यान से देखिएगा कितना सफल रहे है , हम अपनी संस्कृति को जीवित रख पाए तो उसका कारण हमारा सभी वर्गों को पर्वो के नाम पर उनको बांध के रखा , हर तबके के फायदा है इन पर्वो से और सामाजिक सुरक्षा होती है इससे उनकी जीविका बढ़ती है समरसता बढ़ती है परस्पर स्नेह बढता है । लेकिन इनपर हमला हो रहा है इस बार हथियार से नही बौद्धिक आतंकवाद से हमपर हमला किया जा रहा है , जिसका मुँहतोड़ जवाब अभी नही दिया तो कल आप अपने नाम के पीछे लगे आस्पद ढूंढोगे ।।

#विशेष -
जो पर्व हमारी सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं।वे आशा, आकांक्षा, उत्साह एवं उमंग के प्रदाता हैं तथा मनोरंजन, उल्लास एवं आनंद देकर वे हमारे जीवन को सरस बनाते हैं।ये पर्व युगों से चली आ रही हमारी सांस्कृतिक धरोहरों, परंपराओं, मान्यताओं एवं सामाजिक मूल्यों का मूर्त प्रतिबिंब हैं, जो हमारी संस्कृति का अंतरस्पर्शी दर्शन कराते हैं। सनातनी परम्परा को खंडित करने और अपने स्वार्थ पूर्ति की ऐसी कई साजिशो को एक एक कर नंगा किया जा सकता है परन्तु समस्त समस्याओ का लेखन संभव नहीं हो सकता इसीलिए बस आंखे और कान खुला रखिये सब दिखाई सुनाई देगा ।।
#महाभारत_का_कुरुक्षेत्र  --
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कुछ समय पहले एक बार गुस्से में मैंने आर्यसमाज पर कुछ आक्षेप लगाए थे उसका परिणाम हुआ कि उन तर्को का इस्तेमाल फिर विधर्मियों ने शुरू कर दिया , आज ऐसे ही एक सनातनी मित्र ने अपने गुस्से की वजह से एक आक्षेप रखा है , जिसका समय रहते निराकरण कर देना ही उचित होगा ।।

आक्षेप है कि महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र जैसी जगह पर कैसे लड़ा जा सकता है जबकि महाभारत की सेना कही ज्यादा बताई गई है (18 अक्षोहिणी ) , इसपर बहोत से मित्रो ने अपना अपना मत रखा है , मैं भी अपना मत रखना चाहता हूँ -

सर्वप्रथम हम अक्षोहिणी संख्या को सपष्ट कर लेते है , अक्षोहिणी प्राचीन भारत में सेना का माप हुआ करता था। ये संस्कृत का शब्द है। विभिन्न स्रोतों से इसकी संख्या में कुछ कुछ अंतर मिलते हैं। अक्षोहिणी के संदर्भ में हम महाभारत में दिए संख्या को ही मानेंगे इसके अनुसार -

महाभारत के आदिपर्व  सभापर्व और उद्योगपर्व के आलोक में  - 

अक्षौहिण्या: परीमाणं नराश्वरथदन्तिनाम्।
अर्थात - अक्षौहिणी सेना में कितने पैदल, घोड़े, रथ और हाथी होते है?

यथावच्चैव नो ब्रूहि सर्व हि विदितं तव॥
अर्थात - इसका हमें यथार्थ वर्णन सुनाइये, क्योंकि आपको सब कुछ ज्ञात है।

एको रथो गजश्चैको नरा: पञ्च पदातय:। त्रयश्च तुरगास्तज्झै: पत्तिरित्यभिधीयते॥
अर्थात -
सौतिरूवाच उग्रश्रवाजी ने कहा- एक रथ, एक हाथी, पाँच पैदल सैनिक और तीन घोड़े-बस, इन्हीं को सेना के मर्मज्ञ विद्वानों ने ‘पत्ति’ कहा है॥

एको रथो गजश्चैको नरा: पञ्च पदातय:। पत्तिं तु त्रिगुणामेतामाहु: सेनामुखं बुधा:।
त्रीणि सेनामुखान्येको गुल्म इत्यभिधीयते॥
अर्थात -
इस पत्ति की तिगुनी संख्या को विद्वान पुरुष ‘सेनामुख’ कहते हैं। तीन ‘सेनामुखो’ को एक ‘गुल्म’ कहा जाता है॥

त्रयो गुल्मा गणो नाम वाहिनी तु गणास्त्रय:। स्मृतास्तिस्त्रस्तु वाहिन्य: पृतनेति विचक्षणै:॥
अर्थात -
तीन गुल्म का एक ‘गण’ होता है, तीन गण की एक ‘वाहिनी’ होती है और तीन वाहिनियों को सेना का रहस्य जानने वाले विद्वानों ने ‘पृतना’ कहा है।

चमूस्तु पृतनास्तिस्त्रस्तिस्त्रश्चम्वस्त्वनीकिनी। अनीकिनीं दशगुणां प्राहुरक्षौहिणीं बुधा:॥
अर्थात -
तीन पृतना की एक ‘चमू’ तीन चमू की एक ‘अनीकिनी’ और दस अनीकिनी की एक ‘अक्षौहिणी’ होती है। यह विद्वानों का कथन है।

अक्षौहिण्या: प्रसंख्याता रथानां द्विजसत्तमा:। संख्या गणिततत्त्वज्ञै: सहस्त्राण्येकविंशति:॥ शतान्युपरि चैवाष्टौ तथा भूयश्च सप्तति:। गजानां च परीमाणमेतदेव विनिर्दिशेत्॥
अर्थात -
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! गणित के तत्त्वज्ञ विद्वानों ने एक अक्षौहिणी सेना में रथों की संख्या इक्कीस हजार आठ सौ सत्तर (21870) बतलायी है। हाथियों की संख्या भी इतनी ही कहनी चाहिये।

ज्ञेयं शतसहस्त्रं तु सहस्त्राणि नवैव तु। नराणामपि पञ्चाशच्छतानि त्रीणि चानघा:॥
अर्थात -
निष्पाप ब्राह्मणो! एक अक्षौहिणी में पैदल मनुष्यों की संख्या एक लाख नौ हजार तीन सौ पचास (109350) जाननी चाहिये।

पञ्चषष्टिसहस्त्राणि तथाश्वानां शतानि च। दशोत्तराणि षट् प्राहुर्यथावदिह संख्यया॥
अर्थात -
एक अक्षौहिणी सेना में घोड़ों की ठीक-ठीक संख्या पैंसठ हजार छ: सौ दस (65610) कही गयी है।

एतामक्षौहिणीं प्राहु: संख्यातत्त्वविदो जना:। यां व: कथितवानस्मि विस्तरेण तपोधना:॥
अर्थात -
तपोधनो! संख्या का तत्त्व जानने वाले विद्वानों ने इसी को अक्षौहिणी कहा है, जिसे मैंने आप लोगों को विस्तारपूर्वक बताया है।

एतया संख्यया ह्यासन् कुरुपाण्डवसेनयो:। अक्षौहिण्यो द्विजश्रेष्ठा: पिण्डिताष्टादशैव तु॥
अर्थात -
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इसी गणना के अनुसार कौरवों-पाण्डवों दोनों सेनाओं की संख्या अठारह अक्षौहिणी थी।

समेतास्तत्र वै देशे तत्रैव निधनं गता:। कौरवान् कारणं कृत्वा कालेनाद्भुतकर्मणा॥
अर्थात -
अद्भुत कर्म करने वाले काल की प्रेरणा से समन्तपञ्चक क्षेत्र में कौरवों को निमित्त बनाकर इतनी सेनाएँ इकट्ठी हुई और वहीं नाश को प्राप्त हो गयीं।

#गणितीय_निष्कर्ष -  उपवेद धनुर्वेद के अनुसार यदि सैन्य संतुलन किया जाय तो उसके अनुसार -  हर रथ में 3 घोड़े और उनका सारथी होता है जो बाणों से सुसज्जित होता है, उस रथ में दो योद्धा के पास भाले होते हैं और एक रक्षक होता है जो पीछे से सारथी की रक्षा करता है और एक रथी होता है। उसी तरह  हर हाथी पर उसका महावत बैठता है और उसके पीछे उसका सहायक जो कुर्सी के पीछे से हाथी को दिशा देता है, कुर्सी में गजपति या योद्धा धनुष-बाण से सज्जित होता है और उसके साथ उसके दो सहायक होते हैं जो भाले फेंकते हैं और उसका मार्गदर्शक होता है जो युद्ध से इतर अवसरों पर उसके आगे चलता है। अब इसके अनुसार गणना करने पर -

एक अक्षौहिणी सेना नौ भागों में बटी होती थी-
#पत्ति - 1 गज + 1 रथ + 3 घोड़े + 5 पैदल सिपाही #सेनामुख (3 x पत्ति) - 3 गज + 3 रथ + 9 घोड़े + 15 पैदल सिपाही
#गुल्म (3 x सेनामुख) - 9 गज + 9 रथ + 27 घोड़े + 45 पैदल सिपाही
#गण (3 x गुल्म) - 27 गज + 27 रथ + 81 घोड़े + 135 पैदल सिपाही
#वाहिनी (3 x गण) - 81 गज + 81 रथ + 243 घोड़े + 405 पैदल सिपाही
#पृतना (3 x वाहिनी) - 243 गज + 243 रथ + 729 घोड़े + 1215 पैदल सिपाही
#चमू (3 x पृतना) - 729 गज + 729 रथ + 2187 घोड़े + 3645 पैदल सिपाही
#अनीकिनी (3 x चमू) - 2187 गज + 2187 रथ + 6561 घोड़े + 10935 पैदल सिपाही
#अक्षौहिणी (10 x अनीकिनी) - 21870 गज + 21870 रथ + 65610 घोड़े + 109350 पैदल सिपाही

अर्थात - हाथियों पर सवार होते हैं उनकी संख्या 2,84,323 । जो लोग घुड़सवार होते हैं उनकी संख्या 87,480 होती है। एक अक्षौहिणी में हाथियों की संख्या 21,870 होती है, रथों की संख्या भी 21,870 होती है, घोड़ों की संख्या 1,53,090 और मनुष्यों की संख्या 4,59,283 होती है, यदि एक अक्षौहिणी सेना में समस्त जीवधारियों- हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों-की कुल संख्या 6,34,243 होती है तो अठारह अक्षौहिणीयों के लिए 3,93,660 हाथी, 27,55,620 घोड़े, 82,67,094 मनुष्य अर्थात संख्या 11,416,374 हो जाती है ।।

#कुरुक्षेत्र_के_क्षेत्रफल -

कुरु-जनपद प्राचीन भारत का प्रसिद्ध जनपद जिसकी स्थितिं वर्तमान दिल्ली-मेरठ प्रदेश में थी। महाभारतकाल में हस्तिनापुर कुरु-जनपद की राजधानी थी। महाभारत से ज्ञात होता है कि कुरु की प्राचीन राजधानी खांडवप्रस्थ थी। महाभारत के अनेक वर्णनों से विदित होता है कि कुरुजांगल, कुरु और कुरुक्षेत्र इस विशाल जनपद के तीन मुख्य भाग थे। कुरुजांगल इस प्रदेश के वन्यभाग का नाम था जिसका विस्तार सरस्वती तट पर स्थित काम्यकवन तक था। खांडव वन भी जिसे पांडवों ने जला कर उसके स्थान पर इन्द्रप्रस्थ नगर बसाया था इसी जंगली भाग में सम्मिलित था और यह वर्तमान नई दिल्ली के पुराने किले और कुतुब के आसपास रहा होगा। मुख्य कुरु जनपद हस्तिनापुर (ज़िला मेरठ, उ0प्र0) के निकट था। कुरुक्षेत्र की सीमा तैत्तरीय आरण्यक में इस प्रकार है- इसके दक्षिण में खांडव, उत्तर में तूर्ध्न और पश्चिम में परिणाह स्थित था। संभव है ये सब विभिन्न वनों के नाम थे। कुरु जनपद में वर्तमान थानेसर, दिल्ली और उत्तरी गंगा द्वाबा (मेरठ-बिजनौर ज़िलों के भाग) शामिल थे। महाभारत में भारतीय कुरु-जनपदों को दक्षिण कुरु कहा गया है और उत्तर-कुरुओं के साथ ही उनका उल्लेख भी है। अंगुत्तर-निकाय में ‘सोलह महाजनपदों की सूची में कुरु का भी नाम है जिससे इस जनपद की महत्ता का काल बुद्ध तथा उसके पूर्ववर्ती समय तक प्रमाणित होता है। महासुत-सोम-जातक के अनुसार कुरु जनपद का विस्तार तीन सौ कोस था। जातकों में कुरु की राजधानी इन्द्रप्रस्थ में बताई गई है। हत्थिनापुर या हस्तिनापुर का उल्लेख भी जातकों में है। ऐसा जान पड़ता है कि इस काल के पश्चात और मगध की बढ़ती हुई शक्ति के फलस्वरूप जिसका पूर्ण विकास मौर्य साम्राज्य की स्थापना के साथ हुआ, कुरु, जिसकी राजधानी इस्तिनापुर राजा निचक्षु के समय में गंगा में बह गई थी और जिसे छोड़ कर इस राजा ने वत्स जनपद में जाकर अपनी राजधानी कौशांबी में बनाई थी, धीरे-धीरे विस्मृति के गर्त में विलीन हो गया। इस तथ्य का ज्ञान हमें जैन उत्तराध्यायन सूत्र से होता है जिससे बुद्धकाल में कुरुप्रदेश में कई छोटे-छोटे राज्यों का अस्तित्व ज्ञात होता है।

#महाभारत_का_युद्ध_और_कुरुक्षेत्र -

कुरुक्षेत्र, कैथल, करनाल, जींद व पानीपत जिलों को मिलाकर कुरु भूमि बनती है । युद्ध के समय स्थापित किए गए चार यक्ष तीर्थ आज भी विद्यमान हैं। इनमें कैथल में अरंतुक यक्ष गांव बहर पिसौल, कुरुक्षेत्र के रतगल गांव में तरंतुक यक्ष, जींद के रामराय गांव में रामहृदय यक्ष एवं पानीपत के सींख गांव में मचक्रुक यक्ष तीर्थ हैं। कुरुक्षेत्र का मौजूदा क्षेत्रफल है 1530 वर्ग किलोमीटर /कैथल 2317 /करनाल 1967/ जींद 2702/ पानीपत 1268 यानी कुल क्षेत्रफल - 9784 वर्ग किलोमीटर , युद्ध का नियम था कि निःशस्त्र पर कोई प्रहार नही होगा , सूर्यास्त पर युद्ध विराम और एक से एक ही योद्धा है युद्ध करेगा और अपने बराबर वाले से मतलब रथी रथी से सैनिक सैनिक से इस प्रकार -

#पांडवों_की_सेना                   #कौरवों_की_सेना
7 अक्षौहिणी सेना।                  11 अक्षौहिणी सेना
153090 रथ।                       240570 रथ
153090 गज                       240570 गज
459270 अश्व                      721710 अश्व
765270 पैदल सैनिक           1202850 पैदल सैनिक

यानी 7 अक्षौहिणी सेना ही 7 अक्षौहिणी सेना से लड़ रही थी बाकी 4 अक्षौहिणी सेना घायलों की मदद मृतकों को युद्ध स्थान से हटाना उनका दाह संस्कार कर रहे थे रसद आदि की व्यवस्था देख रहे थे क्योंकि युद्ध विराम के बाद शत्रु सैनिक भी शत्रुता नही रखता था । अब यदि इस अनुसार देखे तो  औसत 1,530,720 ×2 = 3,061,440 यानी लगभग 313 व्यक्ति / किलोमीटर युद्ध कर रहे थे , तो प्रश्न ये है कि क्या 313 व्यक्ति / किलोमीटर में नही लड़ सकते है ये जगह कम है अतिश्योक्ति है फर्जीवाड़े जैसा है ???

#विशेष -
भारत की राजधानी दिल्ली में कुल 2 करोड़ 14 लाख लोग 1484 वर्ग किलोमीटर में रहते है यानी प्रति किलोमीटर 12591व्यक्ति , संगम के चारों तरफ फैले 2250 एकड़ के क्षेत्रफल में 2010 के हरिद्वार के कुंभ मेले में  दो सबसे व्यस्त दिनों में लगभग डेढ़ करोड़ तीर्थ यात्रियों के स्नान करने का आँकड़ा मिला ,मौनी अमावस्या पर करीब तीन करोड़ श्रद्धालू महाकुंभ के दौरान एक साथ स्नान करते है !!!
क्या वाकई 18 अक्षौहिणी सेना की संख्या ज्यादा है ?????

#रेफरेंस - क्षेत्रफल आंकड़े , जनसंख्या आंकड़ा -विकिपीडिया , महाभारत , संदर्भ ग्रन्थ एवम कुछ नेट से साभार ।।

#विज्ञान --
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19वीं सदी तक ये माना जाता आया था कि कोई भी पदार्थ अणुओं से मिलकर बना है फिर परमाणु आया उसके पश्चात इलेक्ट्रान प्रोटोन और न्यूट्रॉन आये मतलब विज्ञान भी एक क्रमिक विकास कर रहा है मानवों के साथ, 1930 के दशक में सेमीकंडक्टर की खोज से लोग हैरान हो गए थे, जब उन्हें पता लगा कि असल में बिजली का प्रवाह इलेक्ट्रॉन नहीं करता है बल्कि इलेक्ट्रॉन के भीतर मौजूद खाली जगह की वजह से ऐसा होता है।

एक कॉन्सेप्ट है संश्लेषणता (इन्टैंगल्मेंट) , मैं अल्बर्ट आइंस्टीन को यहाँ कोट करना चाहता हूँ क्योंकि एक विज्ञान जिज्ञासु के लिए वो किसी भगवान से कम नही , उन्होंने कहा था कि -  यह क्वांटम मैकेनिक्स का पागलपन भरा नतीजा है, और ये एक मूर्खता है ।

अल्बर्ट आइंस्टीन के अनुसार ये बिल्कुल गलत था उसका कारण सिर्फ इतना था कि यह उनके गुरुत्व सिद्धांत के साथ ठीक से काम नहीं कर रहा था , या यूं कह लीजिए कि अल्बर्ट आइंस्टीन के गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत क्वांटम मेकेनिज़्म के सिद्धांत पर फिट नही बैठ रहा था , लेकिन इर्विन श्रोडिंगर ने इस नाम को खोजा और ये बताया कि क्वांटम मेकेनिज़्म के सिद्धांत बिल्कुल सही और सटीक है , लेकिन वो सिद्धांत दशकों तक उपेक्षित रहा कारण लॉ ऑफ डोमिनेंस (जी ये लॉ सामाजिक जीवन मे भी काम करता है )

लेकिन संश्लेषण अवस्था जिसे अल्बर्ट आइंस्टीन पागलपन कहते थे,क्वांटम मैकेनिक्स का वो सबसे अहम गुण है , इसे आसान शब्दो मे मैं समझाता हूँ यह पदार्थ की एक टोपोलॉजिकल अवस्था (खाली स्थान की ऐसी अवस्था, जिसमें बदलावों के बावजूद रिक्तता बनी रहे) है,  यह अवस्था, सामान्य पदार्थ के भीतर संश्लेषण गुणों के रूप में छुपी रहती है।

विज्ञान के ऐसे मैं हजारों सिद्धांत गिना सकता हूं जो आज सिर्फ एक चुटुकुला लगते है ।

विज्ञान की एक यात्रा पर चलते है जो अब आसान है लेकिन कभी ये किसी ने कल्पना भी नही की होगी -

अमेरिका में वैज्ञानिकों की टीम ने मानव भ्रूण से उस जीन म्यूटेशन को निकालने में सफलता पायी जो दिल की गंभीर बीमारी के लिए जिम्मेदार था। वैज्ञानिकों ने विवादित जीन एडिटिंग की मदद से बीमारी फैलाने वाले जीन को स्वस्थ जीन से बदल दिया। यह काम भ्रूण में किया गया। CRISPR-Cas9 के नाम से जानी जाने वाली तकनीक की मदद से यह किया गया। CRISPR-Cas9 तकनीक असल में कैंचियों के जोड़े की तरह काम करती है। यह बीमारी के लिए जिम्मेदार जीनोम के खास हिस्से को काट देती है। कटिंग से खाली हुई जगह को नए डीएनए से भर दिया जाता है।

क्या जेनेटिकली ये प्रगति एक मनुष्यों की बेहतर जाती नही बना सकेगी जो आज के ह्यूमन से शारीरिक मानसिक और कही ज्यादा प्रतिरोधके क्षमता के साथ हो ???

चीन के शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग कर यह बताया कि पृथ्वी और अंतरिक्ष के बीच क्वांटम संचार(Quantum Teleportation) संभव है, और अब उन्होंने क्वांटम टेलीपोर्टेशन का उपयोग करके अंतरिक्ष में एक फोटान भेजने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल किया है।
क्वांटम टेलीपोर्टेशन की महत्वपूर्ण जरुरत एक खास प्रकार के क्वांटम इंटरनेट को बनाने के लिए बेहद जरुरी है, इससे सारे क्वांटम कंप्यूटर एक साथ जुड़ कर संपर्क बना सकते हैं। क्वांटम कंप्यूटर एक खास प्रकार के कंप्यूटर होते हैं जो क्वांटम मैकेनिज़्म के नियमों का पालन करके सुपर कंप्यूटर से भी तेज गणना कर सकते हैं। यदि वैज्ञानिक इसमें कामयाब होते हैं तो यह कंप्यूटर भविष्य में एक क्रांति ला सकते हैं।

मन की गति से कही आना जाना गायब होने दूसरी जगह प्रकट होना तब शायद ये पौराणिक चमत्कार विज्ञान लगने लेंगेंगे !!!

विशेषज्ञ मानते है कि ऊर्जा उत्पन्न करने का सबसे सरल तरीका मानव शरीर ही है। वर्तमान उपकरण पुराने उपकरणो की तुलना मे कम ऊर्जा खपत करते है, मानव शरीर से केवल एक माइक्रोवाट ऊर्जा का उत्पादन बहुत से छोटे इलेक्ट्रानिक उपकरणो के लिये पर्याप्त होगा। ऊर्जा का यह उत्पादन मानव शरीर की गतिविधियों के द्वारा होगा, हमे केवल एक ऐसी प्रणाली पहननी होगी जो हमारे शरीर से उत्पन्न ऊर्जा को जमा करेगी। और वैज्ञानिक दृष्टि से ये जल्द ही भविष्य में संभव होगा ।

ऊर्जा का पुंज , ऊर्जा से प्रकट होना ये कुछ ही समय के बाद पौराणिक नही रह जायेगा क्योंकि इसपे विज्ञान की मुहर लग जायेगी!!!

#विशेष -
विज्ञान एक शिशु है जो मानव सभ्यता के साथ धीरे धीरे बढ़ (विकसित ) हो रहा है सभ्यताएं मिटती है पुनः सृजन होकर उन पुरानी सभ्यताओं के वैज्ञानिक आधार पर उंगली उठाती है , ये ऐसा ही है जैसे हॉकिंग, जो खुद संवाद करने के लिये कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का इस्तेमाल करते थे, का मानना था कि कृत्रिम बुद्धि के पूर्ण विकास से मानव जाति का अन्त हो जाएगा। और हां धर्म में तबतक उंगली न करें जबतक उसके संदर्भ में कुछ कहने की योग्यता न हो क्योंकि कुछ हम जैसे भी है जो - अजेष्ठ त्रिपाठी , देल्ही, भारत,पृथ्वी, सौर मंडल,व्याध भूजा, मंदाकिनी आकाशगंगा, स्थानीय आकाशगंगा समूह, कन्या बृहद आकाशगंगा समूह, ब्रह्माण्ड(Ajeshth Tripathi , delhi ,India,Earth, Solar System, Orion Arm, Milky Way Galaxy, Local Group, Virgo Supercluster, Universe)
कहलाये जाने की बजाय अजेष्ठ त्रिपाठी, श्रीमुख शांडिल्य गोत्रीय , ब्रम्हा - कश्यप,असिती,देवल , वेद - सामवेद , त्रिप्रवर - कश्यप,असिती,देवल ,शाखा - कौथुमी , उपवेद - गन्धर्व , शिखा - वाम , पाद - वाम, सूत्र - गोमिल /इष्ट देव - शिव कहलाना ज्यादा पसंद करते है।।

#नोट - तथ्यों तर्को का स्वागत है , मर्यादित रहे, सुरक्षित
         रहें , चूंकि मैं गाली नही देता इसलिए जुकरबर्ग ने 
         इसके लिए ब्लॉक ऑप्शन दे रखा है ।।
#जगद्जननी_माँ_जगदम्बे -

हे माँ ! मैं रजकण आपकी व्याख्या करने का दुस्साहस करने जा रहा हूँ , क्षमा करना माँ ।।

मानव जाति की ये विशेषता रही है कि ये जीवो में सबसे महत्वाकांक्षी है ये सबको चाहता है कि वो उसके अनुसार ही चले यथासंभव उसे अपने अनुसार परिवर्तित करने की कोशिश भी करता है , जब भी बात इष्ट देवी देवताओं की हो तो उसे भी मानव शरीर के सांचे में फिट करने की कोशिश करता है , सोच का दायरा बढाइये मित्रो और वास्तविक स्वरूप में उन्हें सोचिये - 

वेश्या की मिट्टी से माँ की मूर्ति का खंडन पिछली पोस्ट में किया तो अब एक नई अवधारणा सामने आ गयी कि महिषासुरमर्दनी और महिषासुर मानव थे और देवी ने उसका संहार मानव रूप में किया !!

#आइये_चलते_है_महिषासुरमर्दनी_के_वास्तविक_स्वरूप_से_अवगत_होते_है --

शक्ति से सृजन होता है और शक्ति से ही विध्वंस। वेद कहते हैं शक्ति से ही यह ब्रह्मांड चलायमान है और शक्ति ही इस ब्रह्मांड की ऊर्जा है। वेद, उपनिषद और गीता में शक्ति को प्रकृति कहा गया है। जहाँ भी सृजन की शक्ति है वहाँ प्रकृति ही मानी गई है इसीलिए माँ को भी प्रकृति कहा गया है। प्रकृति में ही जन्म देने की शक्ति है। जिसमें भी जन्म देने की शक्ति है वह प्रकृति ही हैै। वेदों में ब्रह्मांड की शक्ति को चिद् या प्रकृति कहा गया है। गीता में इसे परा कहा गया है। इसी तरह प्रत्येक ग्रंथों में इस शक्ति को अलग-अलग नाम दिया गया है , वेद की कौथुमी शाखा में  - दुर्गा, नारायणी, ईशाना, विष्णुमाया, शिवा, सती, नित्या, सत्या, भगवती, सर्वाणी, सर्वमंगला, अम्बिका, वैष्णवी, गौरी, पार्वती और सनातनी- ये सोलह नाम बताये गये हैं, देवी षोडशी की वह प्रेरणा उस समय से भुवनेश्वरी (सम्पूर्ण जगत की ईश्वरी) नाम से प्रसिद्ध हुई। देवी का सम्बन्ध इस चराचर दृष्टि-गोचर समस्त ब्रह्माण्ड से हैं, इनके नाम दो शब्दों के मेल से बना हैं भुवन + ईश्वरी, जिसका अभिप्राय हैं समस्त भुवन की ईश्वरी। देवी भुवनेश्वरी अपने अन्य नाना नामो से भी प्रसिद्ध हैं -

#मूल_प्रकृति -  देवी इस स्वरूप में स्वयं प्रकृति रूप में विद्यमान हैं, समस्त प्राकृतिक स्वरूप इन्हीं का रूप हैं।
हड़प्पन सभ्यता में भी देवी के इस रूप के प्रमाण मिले है
यानी सीधा सा अर्थ है कि देवी भगवती का एक रूप प्रकृति का भी है फिर दुर्गा और महिषासुर का क्या रहस्य है अब इसे देखते है -

#महिषासुर -
महिषासुर’ मूल रूप से ‘महिष’ और ‘असुर’ शब्दों का संयोग है,‘महिष’ का सर्वाधिक पुराना अर्थ ‘महा शक्तिमान’ है, यह ‘मह’ धातु में ‘इषन’ प्रत्यय जोड़कर बना है, जिनमें गुरूता का भाव है। गुरूता भाव लिए ‘मह’ धातु से अनेक शब्द बने हैं जैसे महा महान महत्व महिमा आदि, महिष ऐसे शब्दों में से एक है , रानी को आज भी ‘महीषी’ ही कहा जाता है, भारतीय वाड्मय में ‘महिष’ का अर्थ ‘भैंसा’ पहली बार स्मृति-ग्रंथों में हुआ है, स्मृति ग्रंथों से पहले कहीं भी ‘महिष’ का अर्थ ‘भैंसा’ नहीं मिलता है।
और यदि महिषासुर का सही अर्थ निकाला जाए तो वो असुरों का राजा ही निकलेगा क्योंकि तब महिषी शब्द राजा के लिए प्रयुक्त होता था भैस शब्द था ही नही ।।

#दुर्गा_नाम -
दुर्गा दुर्गा शब्द का पदच्छेद यों है- दुर्ग+आ। 'दुर्ग' शब्द दैत्य, महाविघ्न, भवबन्धन, कर्म, शोक, दु:ख, नरक, यमदण्ड, जन्म, महान् भय तथा अत्यन्त रोग के अर्थ में आता है तथा 'आ' शब्द 'हन्ता' का वाचक है। जो देवी इन दैत्य और महाविघ्न आदि का हनन करती है, उसे 'दुर्गा' कहा गया है।

अब यदि वैदिक साहित्य से इसकी पुष्टि की जाय तो प्रकृति द्वारा किया गया किसी राज्य का समूल विनाश ही महिषासुरमर्दनी माँ जगद्जननी है न कि किसी मनुष्य रूप में किसी से लड़ाई कर के उससे राज्य जीतना यदि ऐसा होता तो जीतने के बाद विजेता ही वहां का राजा बनता है क्या कभी सुना कि अमुक राज्य प्रदेश की रानी थी माता जगद्जननी ।।

#विशेष -
माता के 9 रूपो का उल्लेख -
वैज्ञानिक दृष्टि में महा-अग्निकांड (बिग बैंग) के बाद की अवस्थाएं क्रमशः इस प्रकार हैं-
1. आपः (क्रियाशील) अवस्था-क्वांटम या क्वार्कसूप (शपतथ ब्राह्मण, 1/1/1)
2. बृहती आपः -प्लाज्मा अवस्था (ऋग्वेद, 10/12/7)
3. अपानपात-नाभिक अवस्था या कॉस्मिक मैटर (ऋग्वेद, 1/35/2)
4. अर्ध गर्भ­­­­­: -परमाणु अवस्था (ऋग्वेद, 1/164/36)
5. पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश) का दृश्य जगत्।
यानी आपः , बृहती आपः , अपानपात , अर्ध गर्भ­­­­­: और पंचमहाभूत ये कुल नव रूप है ।।

            सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
           शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते॥
------------------ #मातृ_रूपेण_संस्थिता ------------------

मातृ शक्ति के कुछ उदाहरण यथासंभव आप सभी से साझा करूँगा इन शुभ नवरात्रों में जब हम मातृ शक्ति के पूजन में है, ताकि विस्मृत देवियों से हम प्रेरणा ले सके ---

ऋग्वेद में एक जगह #विश्पला नाम की स्त्री का वर्णन आया है। विश्पला राजा खेल की रानी थी। वह अपने पति के साथ युद्ध में लड़ रही होती है कि तभी राजा खेल पर हुए प्रहार को रोकते हुए उनकी जंघा (घुटने के नीचे का अंग) कट गई। अश्विनी कुमारों ने, जो वैद्य होने के साथ सर्जरी में भी माहिर कहे गए हैं, उसके आयसी जंघा (घुटने में लगाने के लिए लोहे का बना पाँव) लगा देते है , इतना होने पर भी वो युद्ध से नही जाती है और युद्ध जारी रखती हैं ।

मुद्गल की पत्नी #मुद्गलानी (इंद्रसेना) तीरंदाजी में माहिर थी। मुद्गल जब गौ को लेकर उन्हें चराने निकलते है तो दस्यु उनसे गौ को चुराने का प्रयत्न करते है और उनसे युद्ध शुरू कर देते है जैसे ही मुद्गलानी को ये जानकारी मिलती हैवह भी मुद्गल के साथ गाएँ चुरा कर ले जाते दस्युओं से भिड़ंत में धनुष-बाण ले कर मैदान में उतरती है और वीरता पूर्वक आने पती और अपनी गौओ की रक्षा करती है ।

वेदों के अंतर्गत पंचविंश ब्राह्मण में (25.13.3) #रुशमा की कथा आती है। रुशमा कुरुक्षेत्र की रहने वाली थी, उन्होंने इंद्र से युद्ध किया।

             या देवी सर्वभूतेषु मातृ-रूपेण संस्थिता।
             नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

------------------ #शक्ति_रूपेण_संस्थिता ------------------
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दूल्हे को वर कहा जाता है , वर का अर्थ ʻचुना गयाʼ होता है या वरण किया गया या जिसका वरण या चुनाव किया जाए , क्योंकि लड़की अपने लिए अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनती थी। मजे की बात यह है कि वर का स्त्रीलिंग संस्कृत में नहीं बना सकते , क्योंकि लड़की चुनने वाली है, चुनी जाने वाली नहीं। लड़की के लिए स्वयंवरा (स्वयं वरण करने वाली) या पतिंवरा शब्द हैं। आगे चल कर लड़की के लिए वरण की अपनी स्वतंत्रता को स्वयंवर के रूप में एक औपचारिक जश्न बना दिया गया। स्वयंवर में मूलतः तो चुनने की स्वतंत्रता लड़की के पास ही है, विवाहार्थी पुरुषों को उसके आगे नुमाइश की तरह पेश होना है, और उसके द्वारा खारिज किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने का उन्हें अधिकार नहीं है।

           या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभि-धीयते।
         नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
--------- #या_देवी_सर्वभूतेषु_चेतनेत्यभि_धीयते ---------
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जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

 ‘स्त्रियाँ शूद्रों की तरह वैदिक अध्ययन के अयोग्य होती थी’ यही दृष्टिकोण बार बार दिखाया पढ़ाया गया है न। जबकि प्राचीन वैदिककाल में स्त्रियाँ पुरुषों के समान ही मन्त्रद्रष्ट्री होती थीं। उनमें से कुछ के नाम तो वैदिक संहिताओं में भी आये हैं । ‘सर्वानुक्रमणिका’ में बीस ऐसी स्त्रियों के नाम गिनाए गए हैं। आतंरिक स्रोत दिखाते हैं कि लोपामुद्रा, विश्ववारा, सिक्ता निवावारी और घोषा आदि कुछ ऋषिकाएँ हैं, जिन्होंने ऋग्वेद के सूक्तों की रचना की है। इनमें से कुछ ऋषिकाओं और उनके द्वारा रचित ऋग्वेद के सूक्तों का वर्णन निम्नवत् है-

#लोपामुद्रा- प्रथम मण्डल का 179वां सूक्त।

#विश्ववारा_आत्रेयी- पंचम मण्डल का 28वां सूक्त।

#अपाला_आत्रेयी- अष्टम मण्डल का 91वां सूक्त।

#घोषा_काक्षीवती- दशम मण्डल का 39वां तथा 40 वां सूक्त।

#शची_पौलोमी- दशम मण्डल का 149वां सूक्त (आत्मस्तुति)।

#सूर्या_सावित्री- दशम मण्डल का 85वां सूक्त।

उपनिषदों में भी अनेक विदुषी स्त्रियों का नाम आया है, जिनमें सुलभा मैत्रेयी, वडवा पार्थियेयी और गार्गी वाचक्नवी प्रसिद्ध हैं।

न सिर्फ रक्षण ही किया अपितु ज्ञान की स्रोत भी रही ये देवियां आपको नमन ।।

             या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभि-धीयते।
           नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥


#या_देवी_सर्वभूतेषु_बुद्धि_रूपेण_संस्थिता --
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देवताओं और महापुरुषों के साथ उनकी अर्धांगिनियों के नाम भी जुड़े हुए हैं। सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर, लक्ष्मीनारायण, उमामहेश, माया- ब्रह्म, सावित्री- सत्यवान् आदि नामों से नारी को पहला और नर को दूसरा स्थान प्राप्त है। पतिव्रत, दया, करुणा, सेवा- सहानुभूति, स्नेह, वात्सल्य, उदारता, भक्ति- भावना आदि गुणों में नर की अपेक्षा नारी को सभी विचारवानों ने बढ़ा- चढ़ा माना है।

प्राचीन समय में स्त्रियाँ गृहस्थाश्रम चलाने वाली थीं और ब्रह्म- परायण भी। वे दोनों ही अपने- अपने कार्यक्षेत्रों में कार्य करती थीं। जो गृहस्थ का संचालन करती थीं, उन्हें ‘सद्योवधू’ कहते थे और जो वेदाध्ययन, ब्रह्म उपासना आदि के पारमार्थिक कार्यों में प्रवृत्त रहती थीं, उन्हें ‘ब्रह्मवादिनी’ कहते थे। ब्रह्मवादिनी और सद्योवधू के कार्यक्रम तो अलग- अलग थे, पर उनके मौलिक धर्माधिकारों में कोई अन्तर न था।

#उदाहरण—

द्विविधा: स्त्रिया:। ब्रह्मवादिन्य: सद्योवध्वश्च।
तत्र ब्रह्मवादिनीनामुपनयनम्,
अग्रीन्धनं वेदाध्ययनं स्वगृहे च भिक्षाचर्येति।
सद्योवधूनां तूपस्थिते विवाहे
कथञ्चिदुपनयनमात्रं कृत्वा विवाह: कार्य:।
—हारीत धर्म सूत्र

ब्रह्मवादिनी और सद्योवधू ये दो स्त्रियाँ होती हैं। इनमें से ब्रह्मवादिनी- यज्ञोपवीत, अग्निहोत्र, वेदाध्ययन तथा स्वगृह में भिक्षा करती हैं। सद्योवधुओं का भी यज्ञोपवीत आवश्यक है। वह विवाहकाल उपस्थित होने पर करा देते हैं।

शतपथ ब्राह्मण में याज्ञवल्क्य ऋषि की धर्मपत्नी मैत्रेयी को ब्रह्मवादिनी कहा है—
तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव। —शत०ब्रा० 14/7/3/1

अर्थात् मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी।
ब्रह्मवादिनी का अर्थ बृहदारण्यक उपनिषद् का भाष्य करते हुए श्री शंकराचार्य ने ‘ब्रह्मवादनशील’ किया है। ब्रह्म का अर्थ है- वेद। ब्रह्मवादनशील अर्थात् वेद का प्रवचन करने वाली। यदि ‘ब्रह्म’ का अर्थ ‘ईश्वर’ किया जाए तो भी ब्रह्म की प्राप्ति वेद- ज्ञान के बिना नहीं हो सकती; यानी ब्रह्म को वही जान सकता है जो वेद पढ़ता है।

ऋग्वेद की ऋषिकाओं की सूची बृहद् देवता के दूसरे अध्याय में इस प्रकार है—

घोषा गोधा विश्ववारा, अपालोपनिषन्निषत्।
ब्रह्मजाया जुहूर्नाम अगस्त्यस्य स्वसादिति:॥ 84॥
इन्द्राणी चेन्द्रमाता च सरमा रोमशोर्वशी।
लोपामुद्रा च नद्यश्च यमी नारी च शश्वती॥ 85॥
श्रीर्लाक्षा सार्पराज्ञी वाक्श्रद्धा मेधा च दक्षिणा।
रात्री सूर्या च सावित्री ब्रह्मवादिन्य ईरिता:॥ 86॥

#अर्थात्- घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषद्, निषद्, ब्रह्मजाया (जुहू), अगस्त्य की भगिनी, अदिति, इन्द्राणी और इन्द्र की माता, सरमा, रोमशा, उर्वशी, लोपामुद्रा और नदियाँ, यमी, शश्वती, श्री, लाक्षा, सार्पराज्ञी, वाक्, श्रद्धा, मेधा, दक्षिणा, रात्री और सूर्या- सावित्री आदि सभी ब्रह्मवादिनी हैं।

             या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि-रूपेण संस्थिता।
             नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

#या_देवी_सर्वभूतेषु_तुष्टि_रूपेण_संस्थिता ----
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अभी तक आप लोगो ने वैदिक काल की महिलाओं के संदर्भ में मेरे लेख पढ़े , अब आज की इस पोस्ट में कुछ उन महिलाओं के संदर्भ में जानिए जो इतिहास के पन्नो में गुम सी हो गयी है , क्योंकि आजकल लोगो को ये तो पता है कि प्रियंका चोपड़ा कौन है लेकिन प्रीतिलता वड्डेदार, बीना दास, सुनीति चौधरी, शांति घोष ये कौन है तो शायद मुँह से आवाज न निकले, लेकिन ये भी सत्य है कि ये आज बोल सके इसके लिए उन्होंने लड़ाइयां लड़ी और आज वो गुमनाम है -

झांसी की रानी का नाम आप सबसे अपरिचित नही ,रानी गाइंडिनेल्यू को नागालैंड की ‘लक्ष्मी बाई’ के रूप में जाना जाता है। महज 13 साल की उम्र में उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ने का फैसला किया था।
ठीक वैसा ही कर्नाटक में कित्तूर रियासत की रानी, कित्तूर चेन्नम्मा ने समाप्ति के सिद्धांत (डाक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स) की प्रतिक्रिया में अंग्रेजों के खिलाफ़ सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया था ।

कहा जाता है कि महिलाओं को पढ़ने का अधिकार नही मिलता रहा लेकिन चंद्रमुखी बसु, कादंबिनी गांगुली और आनंदी गोपाल जोशी उन भारतीय महिलाओं में शामिल थीं जिन्होंने शैक्षणिक डिग्रियाँ हासिल कीं थी ।

भारत की आजादी के संघर्ष में महिलाओं ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, भिकाजी कामा , प्रीतिलता वाडेकर, विजयलक्ष्मी पंडित, राजकुमारी अमृत कौर, अरुना , सुचेता कृपलानी और कस्तूरबा गाँधी कुछ प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल हैं। अन्य उल्लेखनीय नाम हैं मुथुलक्ष्मी रेड्डी, दुर्गाबाई देशमुख आदि। सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी की झाँसी की रानी रेजीमेंट कैप्टेन लक्ष्मी सहगल सहित पूरी तरह से महिलाओं की सेना थी। एक कवियित्री और स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला और भारत के किसी राज्य की पहली महिला राज्यपाल भी बनी ।

भारत की लगभग आधे बैंक व वित्त उद्योग की अध्यक्षता महिलाओं के हाथ में रही है रक्षा मंत्री विदेश मंत्री भी महिलाएं है।

अरुंधति भट्टाचार्य- स्टेट बैंक ऑफ इंडिया- भारत का सबसे बड़ा बैंक
चंदा कोचर-आईसीआईसीआई बैंक- निजी क्षेत्र में भारत का सबसे बड़ा बैंक
रेणु सूद कर्नाड - एचडीएफसी लिमिटेड - भारत की सबसे बड़ी गृह ऋण कंपनी,
चित्रा रामकृष्ण - नैशनल स्टॉक एक्सचेंज भारत के सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज
शिखा शर्मा-एक्सिस बैंक, शुभलक्ष्मी पणसे - इलाहाबाद बैंक ऑफ इंडिया, विजयलक्ष्मी अय्यर-बैंक ऑफ इंडिया, अर्चना भार्गव - यूनाईटेड बैंक ऑफ इंडिया, नैना लाल किदवई- एचएसबीसीभारत, कल्पना मोरपारिया-जे पी मोर्गन, काकू नखाते- बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच, भारत के शीर्ष पर हैं। उषा सांगवान भारत की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी एल आई सी की प्रबंध निदेशक नियुक्त हुईं।
इसके अतिरिक्त -भारतीय रिज़र्व बैंक के केंद्रीय निदेशक बोर्ड में भी दो महिलाओं को स्थान प्राप्त है- * इला भट्ट व इंदिरा राजारमन।

लेकिन सुना है महिला सशक्तिकरण का पैमाना आजकल कपड़े तय कर रहे है ।।

------- #या_देवी_सर्वभूतेषु_श्रद्धा_रूपेण_संस्थिता ------
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भारतीय स्त्रियों की कामयाबियों की अपनी अलग गाथा है, महत्व है और उनकी अलग अलग तरह की सुर्खियां हैं। चलिए कुछ ऐसे नाम देखते है जिन्हें शायद ही लोग जानते हो लेकिन ये महिला सशक्तिकरण की एक मिसाल है -

#नीरू_चड्ढा (जून, 2017) -
संयुक्त राष्ट्र न्यायिक संस्था “इंटरनेशनल टब्यिूनल फॉर द लॉ ऑफ द सी” (र्अाईटीएलओएसी) में न्यायाधीश चुनी
जाने वाली पहली भारतीय महिला है ये ।।

#शोभना_कामिनेनी (01 मई 2017) -
भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की पहली महिला अध्यक्ष बनी ।।

#तनुश्री_पारिख - सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में शामिल होने वाली पहली भारतीय महिला कॉम्बैट अधिकारी

#कृतिका_पुरोहित - भारत की पहली दृष्टिहीन महिला डॉक्टर है ।

#शिरीन_खुसरो -  तीन खेलों (क्रिकेट, हॉकी एवं बालीबॉल) में देश का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रथम भारतीय महिला है ।

भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई. ए. एस) में शामिल होने वाली पहली भारतीय महिला #अन्ना_जार्ज है वही #किरण_बेदी आईपीएस ।

#नैना_लाल_किदवई (15 दिसंबर 2012) -
वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (फिक्की) की अध्यक्ष निर्वाचित होने वाली पहली प्रथम भारतीय महिला बनकर उस क्षेत्र में उन्होंने पुरुषों का वर्चस्व तोड़ा ।।

#कुछ_बिसरे_क्रांतिकारी -

#कनकलता_बरुआ– कनकलता ने हमेशा देश की सेवा करने और स्वतंत्रता संग्राम में मदद करने के सपने को देखा, 17 साल की उम्र से वह स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होना चाहती थी लेकिन चूंकि वह नाबालिग थी इसलिये वह आजाद हिंद फौज में शामिल नहीं हो सकी। कनकलता का दृढ़ संकल्प ही था कि उन्होंने हार नही मानी और मृत्यु बहिनी में शामिल हो गई। असम में 1924 में पैदा हुई, कनकलता असम के सबसे महान योद्धाओं में से एक थी। वह असम से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा शुरू की गई स्वतंत्रता पहल के लिए “करो या मरो” अभियान में शामिल हो गई। यही नही, भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान असम में भारतीय झंडा फेहराने के लिये आगे बढ़ते हुये उनकी मृत्यु हो गई।

#मातंगिनी_हाज़रा– भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला सदस्यों में से एक, मातंगिनी हाज़रा ने देश की स्वतंत्रता के लिए बहादुरी से लड़ाई लड़ी। लेकिन आज के समय में उनका नाम अनसुना है। इतिहास की किताबों में जिसे हम स्कूलों में पढ़ते हैं उसमें हम इस साहसी महिला का कोई जिक्र नहीं पाते है। वह एक कठोर गांधीवादी और असहयोग आंदोलन की समर्थक थी।  73 वर्ष की उम्र में, वह भारत छोड़ों आदोंलन की में सक्रिय भागीदार थी और उन्होंने 6000 समर्थकों के जुलूस की अगुवाई की जिसमें अधिकतर महिलाएं थी। उसी दौरान तमिलुक पुलिस स्टेशन के अधिहरण के वक़्त उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई जबकि वह पुलिस से अनुरोध करती रही कि भीड़ पर गोली न चलाई जायें।

#भोगेश्वरी_फुकनानी– एक और शहीद का उदाहरण जिसकी शहादत नज़र अंदाज़ कर दी गई जिनका जन्म नौगांव में हुआ था। भारत छोड़ो आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम में लड़ने के लिए भारत के विभिन्न हिस्सों से कई महिलाओं को प्रेरित किया और उनमें से एक बड़ा नाम भोगेश्वरी फुकनानी का था। जब क्रांतिकारियों ने बेरहमपुर में अपने कार्यालयों का नियंत्रण वापस ले लिया था, तब उस माहौल में पुलिस ने छापा मार कर आतंक फैला दिया था। उसी समय क्रांतिकारियों की भीड़ ने मार्च करते हुये “वंदे मातरम्” के नारे लगाये। उस भीड़ का नेतृत्व भोगेश्वरी ने किया था। उन्होंने उस वक़्त मौजूद कप्तान को मारा जो क्रांतिकारियों पर हमला करने आए थे। बाद में कप्तान ने उन्हें गोली मार दी और वह जख़्मी हालात में ही चल बसी।

             या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा-रूपेण संस्थिता।
             नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
------------------------- #शबरीमाला --------------------------

------------ #अनुशासित_परंपरा_या_आडम्बर ------------
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कोई आपसे पूछे कि ब्रह्मांड में कितनी तरह की चीज़े हैं तो आप क्या जवाब देंगे ? जवाब है सिर्फ दो - पहली चीज़ है ऊर्जा यानी एनर्जी (E), दूसरी द्रव्यमान, मैटर या मास (M) । इनके बीच के सिद्धांत को ऊर्जा द्रव्यमान का समीकरण कहते है जिसे E = MC*2 से प्रदर्शित करते है और इस समीकरण के अनुसार ऊर्जा न पैदा होती है न खत्म की जा सकती है। बस अपना रूप बदलती है।

#अब_जरा_इसे_पढिये -

नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत ॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 23)

आत्मा को न शस्त्र  काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है। मतलब उसे नष्ट नही किया जा सकता ।

दोनो में समानता मिली ऊपर का नियम ऊर्जा द्रव्यमान का नियम है जो अल्बर्ट आइंस्टीन द्वारा दिया गया नीचे भगवत गीता में आत्मा के उसी रूप यानी आत्मा के एक ऊर्जा ही होने की पुष्टि की जा रही है , की आत्मा भी ऊर्जा का एक रूप है जिससे मानव शरीर कार्य करता है ।

भारत में बहुत सारे मंदिर हैं। मंदिर कभी भी केवल प्रार्थना के स्थान नहीं रहे, वे हमेशा से ऊर्जा के केंद्र रहे हैं। जहां आप कई स्तरों पर ऊर्जा प्राप्त कर सकते है। चूंकि आप खुद कई तरह की ऊर्जाओं का एक जटिल संगम हैं इसलिए हर तरह के लोगों को ध्यान मे रखते हुए कई तरह के मंदिरों का एक जटिल समूह बनाया गया। एक व्यक्ति की कई तरह की जरूरतें होती हैं जिसे देखते हुए तरह-तरह के मंदिर बनाए जिनका आधार रहा अगम शास्त्र दरअसल आगम शास्त्र कुछ खास तरह के स्थानों के निर्माण का विज्ञान है। बुनियादी रूप में यह अपवित्र को पवित्र में बदलने का विज्ञान है। समय के साथ इसमें काफी-कुछ निरर्थक जोड़ दिया गया लेकिन इसकी विषय वस्‍तु यही है कि पत्थर को ईश्वर कैसे बनाया जाये।
यह एक अत्यंत गूढ़ विज्ञान है , सही ढंग से किये जाने पर यह एक ऐसी टेक्नालॉजी है जिसके जरिये आप पत्थर जैसी स्थूल वस्तु को एक सूक्ष्म ऊर्जा में रूपांतरित कर सकते हैं, जिसको हम ईश्वर कहते हैं दूसरे शब्दों में विज्ञान की व्याख्यानुसार ऊर्जा का केंद्र जिससे हमें ऊर्जा मिलती है ।

#अगम_शास्त्र, बहुत लम्बे समय से हिन्दू धर्म के पूजा-पाठ, मंदिर निर्माण, आध्यात्मिक और अनुष्ठानिक रीति-रिवाज के नियम और मानदंडों के लिए बने विचारों का एक सम्पूर्ण संकलन है। यह संस्कृत, तमिल और ग्रंथ शास्त्रों का एक संग्रह है जिसमें मुख्य रूप से मंदिर निर्माण के तरीके, मूर्ती निर्माण के तरीके, दार्शनिक सिद्धांतों और ध्यान मुद्राओं का सम्पूर्ण संगृह है। बाद के वर्षों में यह विभिन्न प्रकार के श्रोतों और विचारों के आत्मसात हुआ और सम्पूर्ण अस्तित्व में आया (कुछ कुरीतिया भी सम्मिलित हुई)। एक संग्रह के रूप में सम्पुर्ण अगम शस्त्र को दिनांकित नहीं किया जा सकता है इसके कुछ भाग वैदिक काल के पहले के प्रतीत होते हैं और कुछ भाग वैदिक काल के बाद के। मंदिर निर्माण और पूजा में अगम शास्त्र की भूमिका एक पूर्ण उपदेशक और मार्गदर्शक के रूप में, आगम शास्त्र अभिषेक और पवित्र स्थानों के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ज्यादातर हिन्दू पूजास्थल अगम शास्त्र के सिद्धांतों का पालन करतें है।
अगम शास्त्र के चार पद - जैसे की अगम संख्या में बहुत सारे हैं लेकिन उनमे से प्रत्येक के चार भाग होते हैं

     #क्रिया_पद
     #चर्या_पद
     #योग_पद
     #जनन_पद

क्रिया पद मंदिर निर्माण, मूर्तिकला के अधिक साकार नियमों की व्याख्या करता है जबकि जनन पद मंदिर में पूजा की विधि, दर्शन और आध्यामिकता के नियमों की गर्वित व्याख्या करता है ,अगम शस्त्र के अनुसार मंदिर और पूजास्थल कभी भी एसे ही स्वेच्छा से और स्थानीय धारणाओं के आधार पर मनमाने ढंग से नहीं बनाए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी भी हिन्दू तीर्थस्थान के लिए तीन अनिवार्य सारभूत या मौलिक आवश्यकताएं है
 
#स्थल  -   मंदिर की जगह को दर्शाता है
#तीर्थ   -   मंदिर के जलाशय या सरोवर को दर्शाता है
#मूर्ती   -   पूजित प्रतिमा को दर्शाती है

अगम शास्त्र में तीर्थस्थल/मंदिर के प्रत्येक छोटे-छोटे से पहलु, आकृति, दृष्टिकोण और भाव के लिए विस्तार पूर्वक नियमों और तरीकों का विवरण है जैसे की मंदिर का निर्माण किस सामग्री से किया जाना चाहिए, पवित्र प्रतिमा का उचित स्थान कहाँ होना चाहिए और पवित्र प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कैसे करनीं चाहिए आदि आदि।

आसान शब्दो मे ऊर्जा स्थानांतरण के लिए किन नियमो का पालन किया जाए कि हममे स्थित ऊर्जा उस ऊर्जा के केंद्र से ऊर्जा लेकर और अधिक ऊर्जावान बन सके ये हमे अगम शास्त्र का जनन पद बताता है , वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आप ऐसे समझिए कि यदि किसी ट्रांसफार्मर से हम ऊर्जा यानी विद्युत आपूर्ति करते है तो वायर यदि सही न लगाकर गलत लगा दिया जाए तो न सिर्फ उपभोक्ता को नुकसान होगा अपितु उस ट्रांसफार्मर को भी छती पहुँचेगी   और यही होता है जब कोई अपात्र व्यक्ति मंदिर में प्रवेश करता है तो न सिर्फ उसे नुकसान होता है बल्कि उन ऊर्जा केंद्रों का भी ।।

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से 175 किमी की दूरी पर पंपा है और वहाँ से चार-पांच किमी की दूरी पर पश्चिम घाट से सह्यपर्वत श्रृंखलाओं के घने वनों के बीच, समुद्रतल से लगभग 1km की ऊंचाई पर शबरीमला मंदिर स्थित है। मक्का-मदीना के बाद यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है, जहां हर साल करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं ,और हिन्दू धर्म का एक प्रतीक चिन्ह है ये मंदिर इसलिए विधर्मियों की नजर भी हमेसा इसपर रही । मंदिर में अयप्पन के अलावा मालिकापुरत्त अम्मा, गणेश और नागराजा जैसे उप देवताओं की भी मूर्तियां हैं। मंदिर में रजस्वला स्त्री का प्रवेश वर्जित था इसके पीछे कारण था इस समय महिलाओं की औरा नेगेटिव एनर्जी होना , आप हर प्रवेश करने वाली महिला से ये तो पूछ नही सकते कि आप रजस्वला हो या नही इसलिए मंदिर में 10 से नीचे और 50 से ऊपर महिलाओं के प्रवेश की अनुमति थी वो भी उनके ही भले के लिए क्योंकि ऐसा न होने पर मंदिर सिर्फ  एक दर्शन स्थल ही रह जॉयगा उसका प्रभाव कम हो जाएगा , लेकिन फेमिनिस्ट जमात को सिर्फ हिन्दू धार्मिक स्थलों पर ही असमानता दिखती है आशा करता हूं मस्जिद में महिलाओं के नमाज पढ़ने के लिए जल्द ही ये जमात आंदोलन करेगी ।

#विशेष - 
ये मंदिर श्रद्धालुओं के लिए साल में सिर्फ नवंबर से जनवरी तक खुलता है। बाकी महीने इसे बंद रखा जाता है।भक्तजन पंपा त्रिवेणी में स्नान करते हैं और दीपक जलाकर नदी में प्रवाहित करते हैं। इसके बाद ही शबरीमलै यानी सबरीमाला मंदिर जाना होता है।पंपा त्रिवेणी पर गणपति जी की पूजा करते हैं। उसके बाद ही चढ़ाई शुरू करते हैं। पहला पड़ाव शबरी पीठम नाम की जगह है। कहा जाता है कि यहां पर रामायण काल में  शबरी नामक भीलनी ने तपस्या की थी। श्री अय्यप्पा के अवतार के बाद ही शबरी को मुक्ति मिली थी।
इसके आगे शरणमकुट्टी नाम की जगह आती है। पहली बार आने वाले भक्त यहाँ पर शर (बाण) गाड़ते हैं।
इसके बाद मंदिर में जाने के लिए दो मार्ग हैं। एक सामान्य रास्ता और दूसरा अट्ठारह पवित्र सीढ़ियों से होकर। जो लोग मंदिर आने के पहले 41 दिनों तक कठिन व्रत करते हैं वो ही इन पवित्र सीढ़ियों से होकर मंदिर में जा सकते हैं । दरअसल पहले नियम था कि इस मंदिर में 41 दिन के व्रत के बाद ही लोग प्रवेश करते थे इससे उनको ऊर्जा , व्रत के कारण आत्मिक शारीरिक शुद्धि मिलती थी जिससे यहां से जाने पर वो जीवन मे अधिक ऊर्जा से आगे बढ़ते । लेकिन अब सीधे ऊर्जा के केन्द्र को ही दूषित कर देने का कुत्शित प्रयास हो रहा है ताकि हिन्दुओ का धर्मांतरण , उनके हनन में आसानी हो ।

#मंदिर_का_नियम_और_मानव_शरीर -
शबरीमाला मंदिर प्रवेश के लिए 41 दिन के व्रत के लिए जो निर्देश है उनसे क्या लाभ है इसका विश्लेषण भी कर देता हूँ -

1- इकतालीस दिन तक समस्त लौकिक बंधनों से मुक्त होकर ब्रह्मचर्य का पालन करना जरूरी है।

ब्रम्हचर्य के लाभ आज हर वैमानिक पुष्टि करती है कि इससे शरीर मे ऊर्जा बढ़ती है मेडीकली देखे तो स्पर्म काउंट , डेन्सिटी और यौन छमता को बढ़ाया जाता है ब्रम्हचर्य से ।

2- इन दिनों में उन्हें नीले या काले कपड़े ही पहनने पड़ते हैं।
प्रकाश के सबसे अच्छे अवशोषक है ये रंग , चर्म रोग या व्यधि कैलसिफिकेशन आदि रोगी जब 41 दिन तक इन कपड़ो में दैनिक कार्य सूर्य उपासना पूजा कर्म आदि करते है तो उसमें लाभ होता है यहाँ तक कि स्किन कैंसर जैसी समस्या के लिए भी एक प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है 

3- गले में तुलसी की माला रखनी होती है और पूरे दिन में केवल एक बार ही साधारण भोजन करना होता है।
तुलसी माला एक मदिबन्ध पर दवाब डालती है तो रक्तचाप नियंत्रण में रहता है साधारण और 1 समय के भोजन से लिवर और पेट से समस्या खत्म हो जाती है ।

4- शाम को पूजा करनी होती है और ज़मीन पर ही सोना पड़ता है।
मानसिक शांति के साथ , जमीन पर सोने से सर्वाइकल पेन और शरीर के मांसपेशियों को लाभ धरती की चुम्बकीय तरंगों से तन मन को रिलैक्स मिलता है ।
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मैं कुछ पन्नों भर का हूँ...
सामने कुछ मोटी लकीरों वाली नुमाइशी खबरें...
कुछ ब्रांड्स के इश्तिहार भी हैं...
थोड़ा पलटो तो अरमानों के बलात्कारों की खबरें...
ख्वाबों की दुर्घटनाएँ, भरोसे की लूट...
कुछ पुरानी यादों की बरसियाँ...
किसी एक पन्ने पर चमकती दमकती इच्छाएँ...
तीसरा पन्ना होगा शायद वो....
किसी एक पन्ने पर मन की दुनिया छपी मिलेगी...
पर रोज़ नया हो जाता हूँ मैं...
क्यूंकी लोग बासी पसंद नहीं करते...
पर कोई है जिसके पास मेरे कई बासी एडिशन पड़े होंगे...
उसके लिए मैं अख़बार नहीं था न इसलिए...

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